संसद पर हमला करने के आरोप मे मोहम्मद अफझल को मृत्य दंड दिये जाने पर दंभी-साम्यवादी और दंभी-मानवाधिकार वाले शोर मचाने लगे के; अफझल को मृत्य दंड नही देना चाहिऎ और काश्मिर के सभी मुस्लीम राजनैतिक दल भी शोर मचाने लगे, ये सब देखकर ऎसा लगता है के ईस देश मे आप किसी भी त्रासवादी कृत्य करो आपको सजा नही मीलेगी. अगर ऎसे ही देश का संचालन करना है तो ईस न्यायलय कि क्या जरुरत ? बंध कर दो सभी न्यायलय और ईस देश को त्रासवादीओ के हवाले कर दो. प्रश्न संसद पर हमले का नही है अगर ईस त्रासवादीओ ने हमला कर के संसद मे बैठे नालायक राजनैतिक सांसदो मार डाला होता तो, हम भी आज यही त्रासवादीयों के समर्थन मे निकलते और कहते के उसकी सजा माफ करो परंतु ईस त्रासवादीयों ने हमारे सुरक्षा बल के नौजवान की हत्या की है और ईसीलीये ईन को मृत्य दंड मिलना चाहिये. साम्यवादी जो अपने को कहते ह, ईस देश मे ये वास्तव मे साम्यवादी नही है, मैने माओ, लेनिन और चे-गवारा को पढा और देखा के वो लोग बहादुर थे और सही साम्यवादी थे परंतु भारत के साम्यवादी हमेंशा मुस्लीम परस्त और हिन्दु विरोधी रहे है और मुझे तो शंका है के ये साम्यवादी नही है परंतु धर्म-परिवर्तन किये मुस्लीम है और भारत ऎवंम हिन्दुओ को विनाश करने के लिए साम्यवाद का मुखोटा पहेना.
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